Blinking post: भारत के कॉरपोरेट इतिहास में कुछ कारोबारी मुकाबले ऐसे रहे हैं, जिनकी चर्चा आज भी होती है। लार्सन एंड टुब्रो यानी L&T से जुड़ा धीरूभाई अंबानी का अध्याय भी ऐसी ही कहानी है। यह सिर्फ किसी कंपनी में हिस्सेदारी बढ़ाने की कहानी नहीं थी, बल्कि इसमें कारोबारी रणनीति, शेयरहोल्डिंग, सरकारी संस्थानों और कंपनी के नियंत्रण का सवाल एक साथ जुड़ गया था।
1980 के दशक के आखिरी वर्षों में L&T ऐसी स्थिति से गुजर रही थी, जहां कंपनी के शेयर कई निवेशकों और संस्थानों के पास बंटे हुए थे। यही बिखरा हुआ मालिकाना ढांचा आगे चलकर पूरे विवाद की सबसे अहम कड़ी बना।
एक मजबूत कंपनी, लेकिन कमजोर मालिकाना पकड़
L&T उस समय भारत की प्रमुख इंजीनियरिंग और निर्माण कंपनियों में शामिल थी। कंपनी का कारोबार बड़ा था, लेकिन इसके बावजूद किसी एक निजी समूह के हाथ में स्पष्ट नियंत्रण नहीं था। कंपनी से जुड़े फैसलों और उसके प्रबंधन को लेकर भी उस दौर में कई तरह के विवाद सामने आ रहे थे। ऐसे माहौल में L&T पर नियंत्रण हासिल करने की कोशिश करने वाले किसी बड़े कारोबारी समूह के लिए रास्ता अपेक्षाकृत खुला नजर आ सकता था। इसी बीच शेयर बाजार में L&T के शेयरों को लेकर गतिविधियां बढ़ीं और धीरूभाई अंबानी की दिलचस्पी कंपनी में दिखाई देने लगी।
अंबानी परिवार की बोर्ड में एंट्री
L&T में Reliance की हिस्सेदारी बढ़ने के साथ मामला सिर्फ शेयर खरीदने तक सीमित नहीं रहा। मुकेश अंबानी और अनिल अंबानी कंपनी के बोर्ड में पहुंचे। उपलब्ध अदालती रिकॉर्ड के अनुसार, अनिल अंबानी दिसंबर 1988 में बोर्ड से जुड़े थे और अप्रैल 1989 में धीरूभाई अंबानी L&T के चेयरमैन बने।
धीरूभाई के चेयरमैन बनने के बाद यह साफ हो गया कि Reliance की नजर केवल निवेश पर नहीं थी। कंपनी के मैनेजमेंट और रणनीतिक फैसलों में प्रभाव बढ़ाने की कोशिश भी चल रही थी।
चेयरमैन की कुर्सी तक पहुंची कहानी
28 अप्रैल 1989 को धीरूभाई अंबानी ने L&T की कमान संभाली। यह घटनाक्रम भारतीय कारोबारी जगत के लिए बड़ा बदलाव था। एक तरफ Reliance तेजी से अपना कारोबार बढ़ा रहा था, वहीं दूसरी ओर L&T जैसी दिग्गज इंजीनियरिंग कंपनी में उसका प्रभाव लगातार बढ़ रहा था।
लेकिन यह स्थिति ज्यादा समय तक स्थिर नहीं रही।
राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं और केंद्र में वी.पी. सिंह की सरकार आने के बाद Reliance की L&T पर पकड़ मजबूत करने की योजना को झटका लगा। सरकारी वित्तीय संस्थानों की बड़ी हिस्सेदारी के कारण कंपनी का नियंत्रण पूरी तरह Reliance के हाथ में जाना आसान नहीं था।
सरकार बदली तो समीकरण भी बदल गए
L&T में Reliance के प्रभाव को लेकर विवाद बढ़ा और मामला कानूनी लड़ाई तक पहुंच गया। सरकारी संस्थानों की भूमिका भी इस पूरे घटनाक्रम में महत्वपूर्ण रही। आखिरकार धीरूभाई अंबानी को L&T के चेयरमैन पद से हटना पड़ा। उनके बाद कंपनी की कमान डी.एन. घोष के हाथों में गई। Reliance की कोशिश L&T पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित करने की दिशा में आगे नहीं बढ़ सकी और वह कंपनी में एक निष्क्रिय शेयरधारक की स्थिति में रह गया।
जिस सौदे का असर वर्षों तक रहा
L&T पर नियंत्रण हासिल करने की यह कोशिश भले ही धीरूभाई अंबानी के पक्ष में पूरी तरह सफल नहीं हुई, लेकिन इस घटनाक्रम ने भारतीय कॉरपोरेट जगत में एक बड़ा सबक जरूर छोड़ा। इसने दिखाया कि किसी बड़ी सार्वजनिक कंपनी की बिखरी हुई शेयरहोल्डिंग उसे किस तरह नियंत्रण की लड़ाई का केंद्र बना सकती है। साथ ही यह मामला उस दौर के भारत में कारोबारी ताकत, सरकारी वित्तीय संस्थानों और कॉरपोरेट गवर्नेंस के बीच संबंधों की भी झलक देता है। दिलचस्प बात यह है कि L&T और Reliance की यह कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। कई साल बाद Reliance ने L&T में अपनी बची हुई हिस्सेदारी बेच दी और कंपनी के स्वामित्व को लेकर एक नया अध्याय शुरू हुआ।


