Blinking post : अभिनेता और गायक दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ को ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटाए जाने के बाद नया विवाद खड़ा हो गया है। मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित इस फिल्म को रिलीज़ के महज़ दो दिन बाद स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया, जिस पर दिलजीत ने खुलकर अपनी प्रतिक्रिया दी है।
इंस्टाग्राम लाइव के दौरान दिलजीत दोसांझ ने कहा कि उन्हें पहले से ही अंदेशा था कि फिल्म को प्लेटफॉर्म से हटाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि कई दर्शक रविवार को फिल्म देखने की योजना बना रहे थे, लेकिन उम्मीद से पहले ही इसे हटा लिया गया। उनके मुताबिक, यह केवल एक फिल्म का मामला नहीं बल्कि एक ऐसी कहानी की बात है, जिसकी आवाज़ को वर्षों से दबाने की कोशिश होती रही है।
दिलजीत ने कहा कि जसवंत सिंह खालड़ा की आवाज़ को 1995 में भी दबाया गया था और आज, 2026 में भी हालात अलग नहीं दिख रहे। उन्होंने सवाल उठाया कि जब फिल्म में उन्हीं तथ्यों और न्यायालय के रिकॉर्ड का उल्लेख किया गया है, जो सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं, तब भी इसे दर्शकों तक पहुंचने से क्यों रोका जा रहा है। उन्होंने कहा कि यह बात उनकी समझ से परे है।
हालांकि अभिनेता ने इस बात पर संतोष भी जताया कि फिल्म कम समय के लिए ही सही, लेकिन कई लोगों तक पहुंच सकी। उनका कहना था कि सच्ची कहानियां और इतिहास को लंबे समय तक रोका नहीं जा सकता और यह फिल्म आगे भी लोगों तक अपना संदेश पहुंचाएगी।
फिल्म ‘सतलुज’ 3 जुलाई को ओटीटी प्लेटफॉर्म ज़ी5 पर रिलीज़ हुई थी। हालांकि 5 जुलाई को इसे प्लेटफॉर्म से हटा लिया गया। इसके बाद ज़ी5 ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट पर एक बयान जारी करते हुए कहा कि फिल्म ने महत्वपूर्ण चर्चा को जन्म दिया है और दर्शकों के समर्थन के लिए उनका आभार है। प्लेटफॉर्म ने यह भी संकेत दिया कि भविष्य में फिल्म को दोबारा उपलब्ध कराया जा सकता है।
फिल्म का विषय मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन और उनके संघर्ष पर आधारित है। खालड़ा ने 1980 और 1990 के दशक में पंजाब में कथित रूप से लापता हुए लोगों के मामलों को सामने लाने का काम किया था। वे उन परिवारों की आवाज़ बने जो अपने प्रियजनों के बारे में न्याय की तलाश कर रहे थे।
सीबीआई की जांच के अनुसार, 6 सितंबर 1995 को जसवंत सिंह खालड़ा को उनके घर से कथित तौर पर पुलिस अधिकारियों द्वारा उठाया गया था, जिसके बाद उनका कोई पता नहीं चला। इस मामले ने वर्षों तक देशभर में मानवाधिकार और न्याय व्यवस्था को लेकर गंभीर बहस को जन्म दिया।
अब फिल्म के हटाए जाने के बाद एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित फिल्मों और संवेदनशील विषयों की प्रस्तुति को लेकर चर्चा तेज़ हो गई है।


