मुस्कान से पहले इन महिलाओं को भी मिली थी फांसी की सजा, सालों बाद भी क्यों नहीं हुई फांसी?
Blinking post, नई दिल्ली। मेरठ के चर्चित नीला ड्रम हत्याकांड में मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को मौत की सजा सुनाए जाने के बाद मृत्युदंड को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। हालांकि, अदालत से फांसी की सजा मिलना और दोषी को वास्तव में फांसी दी जाना दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। भारत में कई ऐसी महिला कैदी भी हैं, जिन्हें कई वर्षों पहले मौत की सजा सुनाई गई थी, लेकिन वे अब भी फांसी का इंतजार कर रही हैं।
भारतीय न्याय व्यवस्था में मृत्युदंड सबसे कठोर सजाओं में से एक है। इसे असाधारण रूप से गंभीर मामलों में ही दिया जाता है। इसके बावजूद सजा सुनाए जाने के बाद दोषी को फांसी देने से पहले कई कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करना पड़ता है।
देश की जेलों में 21 महिलाएं डेथ रो पर
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की जेलों में मृत्युदंड का इंतजार कर रहे 571 कैदियों में 21 महिलाएं शामिल हैं। इनमें उत्तर प्रदेश की महिलाओं की संख्या सबसे अधिक है।
डेथ रो पर मौजूद महिलाओं से जुड़े मुख्य तथ्य:
• कुल महिला कैदी: 21 महिलाएं, इनमें से 9 महिलाएं उत्तर प्रदेश से हैं।
• अन्य राज्य: केरल, हरियाणा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, पंजाब, बिहार, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की महिलाएं भी शामिल हैं।
• कानूनी स्थिति: कुछ मामलों में हाई कोर्ट की पुष्टि या अपील लंबित है, जबकि अन्य मामलों में सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही अथवा दया याचिका पर फैसला बाकी है।
शबनम का मामला सबसे चर्चित
उत्तर प्रदेश की शबनम का मामला देश में मौत की सजा पाने वाली महिलाओं में सबसे चर्चित रहा है। वर्ष 2008 में अपने परिवार के सात सदस्यों की हत्या के मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद उसे 2010 में मृत्युदंड सुनाया गया था।
• इलाहाबाद हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने उसकी सजा बरकरार रखी।
• उसकी पुनर्विचार याचिका खारिज हो चुकी है।
• उसकी दया याचिका भी खारिज हो चुकी है।
• इसके बावजूद अब तक उसे फांसी नहीं दी गई है।
फेहमिदा और दूसरी महिला कैदियों का मामला
रिपोर्ट के अनुसार, फेहमिदा को 2003 के मुंबई सीरियल ब्लास्ट मामले में 2009 में मौत की सजा सुनाई गई थी। बॉम्बे हाई कोर्ट ने 2012 में सजा बरकरार रखी, लेकिन उनका मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित रहा है।
अन्य मामलें :
• सोनम डागर: 2014 में मौत की सजा सुनाई गई। हाई कोर्ट ने भी सजा बरकरार रखी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में फांसी पर रोक लगा दी थी।
• किरण बाई: उनकी मौत की सजा सुप्रीम कोर्ट से बरकरार रही, लेकिन दया याचिका राज्यपाल के पास लंबित बताई गई है।
• अन्य महिला कैदी: गीता देवी, जालधारा, रूपा सिंह, नजीमा और हसीमा के मामलों में भी अपील या सजा की पुष्टि से जुड़ी प्रक्रिया लंबित बताई गई है।
मौत की सजा के बाद भी क्यों नहीं होती फांसी?
भारत में ट्रायल कोर्ट द्वारा मृत्युदंड सुनाए जाने के बाद सजा को हाई कोर्ट से अनिवार्य रूप से कन्फर्म कराना होता है। इसके बाद मामले की परिस्थितियों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट में अपील और अन्य कानूनी विकल्प उपलब्ध रहते हैं।
फांसी में देरी के कारण:
1. हाई कोर्ट की पुष्टि: ट्रायल कोर्ट के मृत्युदंड को हाई कोर्ट से मंजूरी मिलना जरूरी है।
2. सुप्रीम कोर्ट में अपील: दोषी फैसले को चुनौती दे सकता है।
3. पुनर्विचार याचिका: निर्धारित कानूनी शर्तों के तहत फैसले की समीक्षा मांगी जा सकती है।
4. क्यूरेटिव याचिका: पात्र मामलों में यह एक अतिरिक्त न्यायिक उपाय है।
5. दया याचिका: दोषी संविधान के तहत सक्षम प्राधिकारी के समक्ष दया की मांग कर सकता है।
इन प्रक्रियाओं का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मृत्युदंड जैसे अपरिवर्तनीय फैसले को लागू करने से पहले सभी जरूरी कानूनी पहलुओं पर विचार हो जाए।
रतन बाई जैन का मामला भी चर्चा में
भारत में महिलाओं को फांसी दिए जाने के इतिहास में रतन बाई जैन का नाम भी सामने आता है। वर्ष 1955 में उन्हें तीन लड़कियों की हत्या के मामले में मृत्युदंड दिया गया था, बताया जाता है कि उन्हें संदेह था कि उन लड़कियों के उनके पति के साथ संबंध थे। आरोपों के अनुसार, उन्होंने जहर देकर तीनों की हत्या की थी।
• मामला वर्ष 1955 का है।
• रतन बाई जैन को तीन लड़कियों की हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था।
• 3 जनवरी 1955 को उन्हें फांसी दी गई थी।
• उनका मामला भारत में महिलाओं को न्यायिक रूप से फांसी दिए जाने के दुर्लभ उदाहरणों में गिना जाता है।
मुस्कान के मामले में आगे क्या होगा?
नीला ड्रम हत्याकांड में मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को सुनाई गई मौत की सजा के बाद आगे की न्यायिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।
ध्यान देने वाली बातें:
• ट्रायल कोर्ट की सजा के बाद हाई कोर्ट की पुष्टि जरूरी है।
• दोषियों के पास उपलब्ध कानूनी उपाय अपनाने का विकल्प हो सकता है।
• दया याचिका की प्रक्रिया भी लागू परिस्थितियों में सामने आ सकती है।
• जब तक कानूनी प्रक्रियाएं पूरी नहीं होतीं तब तक फांसी को अंतिम परिणाम नहीं माना जा सकता।


